For those who love someone and want to express their love to the world.

Friday, July 17, 2009


एक शेर


याद तुझे दिल करता है

टप-टप आँसू बहते रहते हैं

हर याद पे एक ज़ख्म उभरता है

पर वक्त के साथ हर घाव भरता है

लोग तो हमेशा यही कहा करते हैं

पर लोग नहीं

इंकार और जुदाई का दर्द बस दिलजले ही सहा करते हैं

Thursday, July 16, 2009

दर्द है कितना
दर्द है इतना मुझको
फ़िर भी कह नहीं सकता मैं तुझको
तन्हाई क्या होती है ?
समझ लो बस जीने नहीं देती है
बीच भंवर में कश्ती का साथ जब छुटा
एक तिनका मिला
बदकिस्मती अपनी
वो तिनका भी किसी और का निकला

काटना नहीं ये पहाड़ सा वक़्त
हर लम्हा लगता है पत्थर सा सक्त
डर है मुझको
कहीं मैं भी पत्थर न बन जाऊं
इन पथरीले लम्हों के बीच
अब बाकी बचा न वो एहसास
जिन्दा रख सकूँ मैं जिस से
अपने दिल को सींच

जो साथ था कारवां मेरे
वो तो कभी का ,कहीं छूट गया
मैंने शायद गलती की
राहों को चुनने में
तभी तो मेरा घरौंदा
मुझी से रूठ गया

अब क्या करूँ मैं
समझ नहीं आता
सोच के देखो
मेरा दर्द-ऐ-दिल और क्या गाता
--अमित सागर



Wednesday, July 15, 2009

क्षमा करें
मुझे माफ़ कर दें वेद भाई ये सिर्फ़ एक रचना है
और कुछ नहीं ये मेरे प्यार की अनुभूति नहीं बल्कि
बस एक ख्याल था की कोई काम में कितनी हद तक
धंस सकता है । बस इसे अन्यथा मत लें रचना समझ कर ग्रहण करें।
धन्यवाद्
अमित सागर

Saturday, February 21, 2009

सौ बार जीता सौ बार मरता हूँ
कैसे ऐतबार दिलाऊं तुमको
कि कितना प्यार है
तुमसे हमको
रोता हूँ इसलिए
कि तुम समझ न सकीं
मुझको मेरे प्यार को
जीता हूँ इसलिए कि
कभी न कभी पा सकूँ
तुमको, तुम्हारे प्यार को
जुदा हूँ तुम से मैं आज
और ये जुदाई
दर्द देती है इतना के
जितना मैं सह न सकूँ
फिर भी प्यार तुमसे मैं करता हूँ
एक एक पल में

सौ बार जीता हूँ, मरता हूँ
----
अमित सागर

जिंदा किस लिए हूँ ?
मैं जिंदा किस लिए हूँ ?
बस तेरे लिए
बस तुझे पाने के लिए
और जो तुझे न पा सका
तो जी के क्या होगा
मरना ही शायद तब भला होगा
क्यूंकि सह न पाउँगा फिर तेरी जुदाई मैं
तड़प के रह जाऊँगा तेरी तन्हाई में
बिरहा की अग्नि में जल जाऊँगा
मैं तो बस मर जाऊँगा
ए मेरे खुदा -
जीते जी मत मारना मुझे
अच्छा होगा मेरी प्रिया
दे देना मुझे
साँसे मेरी लौटा देना मुझे
इश्क की दुहाई है तुझे
वरना कोई न फिर
तुझे से प्यार की भीख मांगेगा
बस प्यार की तड़प में अपनी जान देगा
मत करना नाइंसाफी मेरे साथ
रख देना मेरे सर पे तू अपना हाथ
दे देना उसे मुझे तू
दिल मेरा देगा तुझे दुआएं लाख
जलती रहेंगी तब तक
मेरे दिल में उम्मीदें
जब तक दे नहीं देता
उसे मुझे तू
-----अमित सागर

चकनाचूर हो गया
जिंदगी में एक वाक्य सा हो गया
लगता है जैसे कहीं कुछ खो गया ll
वो दिन, वो पल बहुत याद आते हैं
पर कहाँ वापिस आएगा एक बार जो गया ll
जी लेता हूँ कभी-कभी, उन यादों को याद कर
पर कब तक जी सकूंगा, जब अपना ही बेगाना हो गया ll
कोशिश तो बहुत की थी, की सपनों को सच कर दूँ
पर हसरतों को हकीक़त में बदलना ही एक सपना सा हो गया ll
माना जिंदगी ने हमें बहुत कुछ दिया, हमनें भी बहुत कुछ किया
पर जो आशियाँ था मेरा, जो जहाँ था मेरा, चकनाचूर हो गया ll
अमित सागर

Monday, February 11, 2008

जिंदगी

जिंदगी तो सभी जीते हैं
मगर जो कुछ कर-गुज़रते हैं
वही चुनिंदा होते हैं
जिंदगी की नेमत तो
बस मिलती है एक बार
इसे हंसी, ख़ुशी से गुजार दो
दूध का क़र्ज़ उतार दो
कोई झुक जाता है,
रूक जाता है कोई
पर जो आगे बढ़ते जाता है
वही सितारों से भरी
बुलंदी को पाता है
सुना है बड़ी शिद्दत से मिलता है
जीने का एक अनमोल अवसर
तो क्यों ना इसका लाभ उठाएं
अपने नाम को सदा के लिए
अमर कर जाएँ
होती है जिंदगी हर किसी की अपनी
इसे है जीना अपने ढंग से
हमें न बदल पाए ये दुनिया
बल्कि हम ही सजायें उसे
अपने रंग से

अमित सागर
प्रथम इतिहास (प्रतिष्ठा)
दोस्त और दोस्ती

मैंने भी दोस्ती की है
दोस्त मुझे भी मिले हैं
खुशनसीब हूँ

इसलिए जिंदगी में मेरी
दोस्ती के फूल खिले हैं

बहुत वक़्त गुज़रता है
दोस्तों के साथ

हर दिन हर रात
इस कदर करीब हैं कि
होती है बस उनकी बात

कभी वो रुठते हैं
कभी मैं रूठता हूँ
कभी वो मनाते हैं
कभी मैं मनाता हूँ
दोस्ती से ही
ज़िंदगी के हर पल
को जगमगाता हूँ


जब कभी वो दूर होते हैं
तो याद बहुत करता हूँ
इस लिए दोस्तों की दूरी से
बहुत डरता हूँ

जब कभी मुसीबत है आती
मुश्किलों से सामना होता है
तो एक पूकार पे वो
दौड़े चले आते हैं
मुझसे पहले वो
मेरी मुश्किलों को
अपना सीना दिखाते हैं

इसलिए तो नाज़ उनपर
करता हूँ
फक्र है कि वो
ऐसे दोस्त हैं
ऐसी दोस्ती है
उनकी दोस्ती से ही
तो ये जिंदगी है

अमित सागर
प्रथम इतिहास(प्रतिष्ठा)

Wednesday, December 12, 2007

तुम्हारे लिए

तुम्हारे लिए मैंने
क्या-क्या नहीं किया
एक-एक पल बस
तुम्हें देख कर जीया
तुमने मेरा प्यार कबूल

नहीं किया
इस दर्द में मैं
तदपा
फिर भी याद
तुम्हीं को किया

कोशिश पे कोशिश
दर कोशिश
मुकद्दर ने हमारा
मजाक उड़ाया
इस पर भी उपरवाले को

हम पे तरस न आया
तुम भी क्या कम थी
तानों पे ताने
उस पर भी हमारा
दिल जलाने में
तुम्हें मज़ा आया
हमें खून के आंसू रुलाया
इश्क कि नाकामयाबी
के सदमे ने हमें
कभी कुछ करने नहीं दिया
फिर भी इस दर्द
के नाम,
तेरे नाम
अपनी पूरी जिंदगी
को किया
--अमित सागर

Saturday, December 8, 2007

वो

देखता हूँ जब कभी उसे
पाता हूँ एक
प्रेरणादायी श्रोत के रुप में
चट्टान सी दृढ़ता
कर्त्तव्यनिष्ठा भास्कर सी
रश्मियों सी चंचलता
जल सी द्रवता
धैर्य अवनि सा
समय सी निरंतरता
प्रेम भावना, सामंजस्य, दृढ़ता एवं
सौंदर्य की
अकूत सम्पदा लिए हुए
वो चली आ रही है
या कहूं
कि
जग को चला रही है

कोई दूसरा नहीं है
उसके जैसा
क्यूंकि
वो तो वो है
देखो वो चली आ रही है
लगता है मेरी तरफ ही आ रही है
चौधरी सुखवीर सिंह "भास्कर"

वादा

चाहे सारे वादे
जो मैंने अब तक किये हैं
झूठे क्यों न हो जाएँ
पर ये वादा न झुठलाउंगा
कि तुमको मैं एक दिन पाऊंगा
वचन लेता हूँ मैं आज अपने आप से
कि एक दिन मैं तुमको पाउँगा
जो सोचते हैं लोग
कि मैं न कर पाउँगा
वो मैं कर के दिखलाउंगा
तुमने कभी मुझे अपने दिल में

आने नहीं दिया
प्यार का फूल खिलाने नहीं दिया

पर एक दिन
तुम्हारे दिल के एक कोने में
अपनी बंजर ज़मीं पर
लाल गुलाब खिलाऊंगा मैं
तुम देखोगी, ये दुनिया देखेगी
कि मैं भी क्या चीज़ हूँ
jo हो नहीं सकता मेरा
बनता हूँ कैसे दिल उसका
जां उसकी

Friday, December 7, 2007

मरा होता है

क्या तुम ये जानती हो?
जब कोई किसी को
चाहता है
और वो उसे न मिलता है
तो कितनी पीड़ा होती है?

बस पीड़ा ही पीड़ा होती है
जब कोई किसी कि
अराधना करता है
उसकी साधना करता है
और उसकी साधना निष्फल हो जाती है
तो क्या होता है ?
वो अश्रु-पूर्ण भाव विकल हो जाता है
अपने ही होम में जल जाता है
अस्वीकार्य हो जाना
प्रेम न मिल पाना
उसके लिए तो कुछ नहीं

जिसे उसकी चाहत
मिल जाती है
पर जिसे न मिलती है
उसका क्या होता है
जिंदा हो के भी
वो मरा होता है

--अमित सागर

मुझसे अपने आप को नहीं

क्या तुम कभी
सुन सकती हो
मेरे दिल कि आवाज़ को
नहीं न
मेरा दिल चीखता है
चिल्लाता है
चित्कारता है
पर तुम क्यों सुनोगी

काश तुम्हारा दिल
कभी मेरे लिए धड़क उठे
और ये कह उठे
"हाँ मैं तुमसे प्यार करती हूँ
हाँ,अमित तुमसे ज्यादा

मुझे कोई चाह नहीं सकता"
पर तुम क्यों सुनोगी
तुम्हें सुनने कि ज़रूरत क्या है
इस दुखते दिल की टीस
क्या ज़रूरत है तुम्हें
इस रोते दिल की आंसुओं
को पोंछ्नें की
तुम टोह चाहती ही हो
मुझे पल-पल में सौ मौतें देना
अपने आपको मुझसे
छीन लेना
पर याद रखना प्रिया
तुम मेरी साँसे तो
छीन सकती हो
पर मुझसे अपने आपको नहीं

मेरी रूह को मिटा सकती हो
पर मुझसे अपने आप को नहीं

--अमित सागर

Sunday, November 25, 2007

Tuesday, November 6, 2007

पिता
उससे बहुत ही गहरा नाता है

वही तो हमारा सबसे बड़ा दाता है
सृजक की भूमिका वह निभाता है
पिता तो बस पिता होता है
वही हमें दुनिया दिखलाता है
ऊँगली पकड़ कर चलना सिखलाता है
अपने बच्चे को बोलना बतलाता है
पिता तो बस पिता होता है
नई पौध को पानी देता है
सूरज की तेज़ किरणों से उसे बचाता है
उसको कोई तकलीफ न हो

सो स्वयं ही सबकुछ सह जाता है
पिता तो बस पिता होता है
अपना पेट काट कर
हमें खाद खिलाता है
अच्छी से अच्छी सुविधा-सेवा करता है
निस्वार्थ भाव से हमारे लिए चिंतित रहता है
पिता तो बस पिता होता है
अपनी कृति के फल फूल जाने पर
वह चैन की एक सांस ले पाता है
सोचता है,
अब उसे क्या ग़म
बडे हो चुके होते हैं हम
अपनी आराधना पर मंद-मंद मुस्काता है
पिता तो बस पिता होता है
लेकिन होता है वही
जो हमेशा होता है

नए के आने पर पुराना उपेक्षित हो जाता है
भूल जाती है उसे नव पीड़ी
और भुला देती है उसके बलिदानों को

उनको मालूम न होता है कि
पिता तो बस पिता होता है
हमें अपना समझ कर
क्षमा पे क्षमा किये जाता है वो
और एक दिन बिना कुछ कहे -सुने
हमें अकेला छोड़ चला जाता है वो
तब हमें याद आता है कि
पिता तो बस पिता होता है
एक दिन हम भी पिता बनते हैं
जो उसने हमारे लिए किया था
वही हम नए के लिए करते हैं
फिर हमारे साथ भी वही होता है
क्योंकि,
पिता तो बस पिता होता है
--अमित सागर

Monday, November 5, 2007

एक शेर

फलक देता है जिनको ऐश
उनको गम भी होते हैं
जहाँ बजते हैं नक्कारे
वहाँ मातम भी होते हैं
--अज्ञात

Sunday, November 4, 2007

लक्ष्य
जीवन का लक्ष्य एक है मेरा
कुछ हासिल करना है
बुलंदियों को छूना है
बस जो चाहता हूँ
वो कर दिखाना है
मंजिल तो दिख रही
पर दूर है
रास्ते काटों से भरपूर हैं
फिर भी लक्ष्य पाना तो है ही
एक दिन शिखर पर जाना
तो है ही
सिर्फ एक प्रयास कि जरूरत है
वह प्रयास हो मेहनत का
लक्ष्य पाने कि सच्ची लगन का
हर बाधा पार करने के जूनून का
तो फिर क्या दुर्जय रह जाएगा
सबकुछ,
ये पृथ्वी, ये आकाश
मेरा हो जाएगा
--अमित सागर

Friday, November 2, 2007

एक शेर

किश्ती हदे तूफां से निकल सकती ,
बात बिगड़ी हूई फिर से बन सकती है
हौसला रखें अपने इरादे को ना बदलें ,
तक़दीर किसी भी रोज़
बदल सकती है
--अनजान

I can

I can change everything
from present to future
from desire to destiny
from own's outlook to the world
with my own ability,skill and talent
with my knowledge and wisdom
with my own power and labour
--Amit sagar

Thursday, November 1, 2007

मंज़िल
जिंदगी कि राह पर चल पड़े हम अकेले
न लिए खुशियाँ न गम
बस थे यादों के मेले
चलते-चलते उस राह पर
थके हमारे कदम
हम रुके फिर उठे और कहा
खुद से पूछा -
"क्या इतना ही है दम ?"

नज़रें उठा के देखा तो
मंज़िल थी बहुत दूर
राह के कंकरियों ने
किया हमारा हौसला चूर
अभी तो आगे थे
चट्टान और तूफान
बस हवा के झरोखे ने किया
हमें हमारे हमारे पथ से अनजान

हमने मन को समझाया
कर याद बीते पलों का
हमने मन को बहलाया
और कहा
जिस तरह इतनी दूर आयें हैं
आगे भी चले जायेंगे
अगर रुके और पड़े कमज़ोर
तो दुसरे पथिक आगे निकल जायेंगे

जिंदगी कि राह
आसान नहीं होती
पर हो हौसला साथ
तो मंज़िल दूर नहीं होती
जो लोग हिम्मत और
विवेक कि कुंजी लिए होते हैं
वही यथार्थ में मंज़िल रुपी
दरवाज़े तक पहुँच पाते हैं
डरपोक और अविवेकी तो
खाली हाथ लॉट जाते हैं

--प्रियंका

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New Delhi, New Delhi, India
I am Amit Sagar living presently in New Delhi originally from Patna.