रात के तीन बज रहे थे
नींद कहीं नहीं थी
थी तो बस एक मायूसी
इश्क और दर्द भरे गीत
सुन रहा था मैं उस वक्त
बस याद आ गई तुम्हारी
और वो दिन जब रोज़ तुमको
मैं देखा करता था
दर्द और बेबसी इतनी बढ़ गई की
मैं मजबूर हो गया
एल्बम से तुम्हारी तस्वीर निकलने को
तस्वीर निकली और
एकटक उसे देखता रहा
जब आँखों में आंसू आ गए
तो तुम्हारी तस्वीर सीने से लगा ली
और खूब रोया
और कुछ भी तो नहीं कर सकता था मैं
वो गीत अब भी कानो में पड़ रहे थे
जो दिल को छेद रहे थे
और रूह को भेध रहे थे।
अमित सागर
For those who love someone and want to express their love to the world.
Tuesday, September 29, 2009
तन्हाई
जब कोई किसी से जुदा हो हो , जुदाई हो
जब अकेलापन हो, कोई साथ नहीं
जब किसी से कुछ कहने का दिल करे
और वो बात दिल में ही दबी रह जाए
लफ्ज़ लबों में ही उलझ कर रह जाएँ
जब वक्त कटता नहीं
और लम्हा गुज़रता नहीं
जब पल-पल एक टीस सी उठती हो
और दर्द बढ़ता हो
बेचैनी बढती हो
जब कहीं मन नहीं लगता
और जिंदगी बोझ सी लगती है
जब रोने का जी करता हो
और आंसू थमते नहीं
जब रातों को नींद नहीं आती
और किसी की याद जेहेन से
एक पल को भी नहीं जाती
जब जहाँ जशन में डूबा हो
और कहीं वीरानी हो
जब गुज़रा हुआ वक्त कभी न भुला जाए
और फिलवक्त हमेशा डराए
जब कदम लड़खराए
वजूद हिल जाए
और अपने याद आ जाएँ
वही तो तन्हाई है
हाँ यही तो तन्हाई है
जब अकेलापन हो, कोई साथ नहीं
जब किसी से कुछ कहने का दिल करे
और वो बात दिल में ही दबी रह जाए
लफ्ज़ लबों में ही उलझ कर रह जाएँ
जब वक्त कटता नहीं
और लम्हा गुज़रता नहीं
जब पल-पल एक टीस सी उठती हो
और दर्द बढ़ता हो
बेचैनी बढती हो
जब कहीं मन नहीं लगता
और जिंदगी बोझ सी लगती है
जब रोने का जी करता हो
और आंसू थमते नहीं
जब रातों को नींद नहीं आती
और किसी की याद जेहेन से
एक पल को भी नहीं जाती
जब जहाँ जशन में डूबा हो
और कहीं वीरानी हो
जब गुज़रा हुआ वक्त कभी न भुला जाए
और फिलवक्त हमेशा डराए
जब कदम लड़खराए
वजूद हिल जाए
और अपने याद आ जाएँ
वही तो तन्हाई है
हाँ यही तो तन्हाई है
Monday, September 7, 2009
श्रधांजलि
हमारी इस छोटी सी जिंदगी में कुछ लोग ऐसे भी आते हैं जिनकी छाप हमारे मन-मस्तिष्क पर ताउम्र के लिए रह जाती है। वो लोग कुछ ख़ास होते हैं तभी तो हमारी जिंदगी में हमेशा उनका महत्व बरकरार रहता है। किसी की दादी, किसी की नानी, किसी के पिता, किसी की बहिन, किसी का भाई, किसी के पड़ोसी अथवा किसी के शिक्षक का उसकी जिंदगी में बड़ा अहम् किरदार होता है। यह महत्व कभी सफलता, कभी अच्छे विचार, इज्ज़त, आदर-सम्मान, अथाह प्रेम के लिए होता है। वो जितना भी समय हमारे साथ बिताते हैं, उनके साथ बिताये लम्हें सदा के लिए हमारे साथ रह जाता है। हमारी अमूल्य धरोहर बन जाते हैं। और जब उनसे अलग हो कर, बहुत वक्त बीत जाने के बाद अगर हम उन लम्हों को याद करते हैं तो हम पाते हैं कि वो पल जो हमने किसी अपने के साथ जीये थे वो क्या गज़ब के पल थे! अमूल्य, अजर, अमर, अतुलनीय, करिश्माई।
सबकी जिंदगी की तरह मेरी जिंदगी में भी ऐसी ही एक शक्शियत ने कभी किसी समय प्रवेश किया था। उनसे प्रथम मुलाकात से लेकर आखिरी मुलाकात तक सबकुछ मुझे जस का तस याद है। वो मेरी हायर सेकेंडरी की शिक्षिका डॉ. इंदुमती पाठक थीं जो मुझे हिन्दी पढाया करती थीं। यह कहानी या यों कह लें की मेरी यह संस्मृति उनको मेरी ऑर से श्रधांजलि है। इस कहानी को लिखने की वजह अभी -अभी गुजरा शिक्षक दिवस है जिसने मुझे मजबूर कर दिया कि आप सब के सामने मैं अपने अनुभव को रख सकूँ। सब की तरह मुझे भी बहुत से शिक्षकों ने पढाया है और सब ने मेरी जिंदगी को किसी न किसी हद तक प्रभावित किया है पर जो प्रभाव उन्होंने मेरे व्यक्तित्व पर छोड़ा है वो अमिट है। यही वो लम्हें हैं जो मेरी बेशकीमती पूंजी हैं।
मैं उनसे ग्यारहवीं कक्षा में प्रथम बार मिला था। वो मेरी वर्ग शिक्षिका थीं। शायद इसीलिए हमसे कठोरता भरा बर्ताव करती थीं। हमारी किसी भी गलती पर वो हमे बक्क्षती नहीं थीं। हमारे अन्दर एक डर समाया रहता था कि कहीं भी कोई गलती हुई तो उनसे डांट सुननी पड़ेगी। मैं तो उनसे दो थप्पड़ भी खा चुका था। स्कूल लेट पहुँचने पर, पोशाक साफ़ और इस्त्री नहीं होने पर, बाल छोटे नहीं होने पे , और तो और जूते पोलिश न होने पर डांट पड़ती थी और वो हमें कक्षा से कान पकड़ के बाहर भी कर देती थीं। वो हमारी एक भी बात नहीं सुनती थीं। कक्षा के बिगडे से बिगडे बच्चे भी उनके सामने पानी भरते थे, भीगी बिल्ली बने रहते थे।
इसी तरह वक्त गुज़रता जा रहा था। हमलोग अब बारहवीं में आ गए थे और खुश थे कि अब इंदु मैडम वर्ग शिक्षिका नहीं होंगीं, सो कोई रोक-टोक नहीं होगी, कोई डांट नहीं, कोई डर नहीं होगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इंदु मैडम फिर से हमारी वर्ग शिक्षिका नियुक्त हुईं थीं। जब हमें पता चला तो हमारी तो समझो नानी ही मर गई हो। सब के सब शोक में डूब गए। उनके रवैये में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। एक बार की घटना है। कक्षा में मैडम उपस्थिति दर्ज कर रहीं थीं। मेरा क्रमांक जब गुज़र गया तब मैं कक्षा में पहुँचा। मेरी उपस्थिति दर्ज नहीं की गयी। मैंने मैडम से कहा तो उन्होंने कहा कि तुम लेट आए हो, हाजिरी नहीं बनेगी। मुझे बड़ा गुस्सा आया। मैंने इसकी शिकायत प्रधानाचार्य से की तो उन्होंने मुझे ही उल्टा डांट दिया और कहने लगे कि मैं ही समय पर विद्यालय आया करूँ। मैं मन मसोस कर रह गया। उनका डर हर पल और अधिक गहरा होता जा रहा था। एक दिन हम अपने अंग्रेजी के शिक्षक से मैडम के बारे में बात कर रहे थे। हम ने उन्हें बताया कि हमें मैडम से बहुत डर लगता है तो वो कहने लगे कि उनको भी मैडम से बहुत डर लगता है। हम तो जैसे सकते में आ गए। बस ये ही सोचने लगे कि ये कैसी माया है, शिक्षक को भी शिक्षक का डर है।
वक्त इसी तरह गुज़रता जा रहा था। कुछ दिनों बाद मुझे ये पता चला कि मैडम ने अब तक शादी नहीं की है। इसलिए उनकी कोई संतान नहीं है। हम इसी वजह से ये सोचने लगे कि अपनी कोई संतान नहीं है तभी मैडम इतनी निष्ठुर हैं। इसीलिए उनकों बच्चों से स्नेह नहीं है, बच्चों से प्रेम नहीं है। हम उन से बहुत नफ़रत करने लगे थे। और ये चाहते थे कि कब इस जंजाल से हमारा पीछा छूटे। आख़िर विद्यालय से निकलने का वक्त आ ही गया। हमारी बारहवीं की परीक्षाएं आ गयीं थीं। मैं बड़ा खुश हुआ कि अब कोई झंझट नहीं रहेगा । दिन अब अच्छे से बीतेगा। मेरी कक्षा के सारे बच्चों ने खूब मेहनत की परीक्षा के लिए। हमने कोई कसार नहीं छोड़ी। फिर परीक्षा के बाद परिणाम आया।
मेरी कक्षा का कोई भी बच्चा फेल नहीं हुआ। सब के सब अच्छे नम्बर से पास हो गए थे।
मेरा परिणाम सबसे अच्छा था सो मैंने सोचा कि मैडम का मुंह मीठा करा देना चाहिए इतनी बड़ी खुशी जो मिली थी। और अब कोई डर भी नहीं था मैडम की डांट का। मैंने प्रथम स्थान जो पाया था परीक्षा में। मैं शाम को सीधे उनके घर गया ,साथ में मिठाई का डब्बा भी था। उनके घर पहुँचने के बाद डोरबेल बजायी तो वो वो बाहर आयीं। मुझे देख कर वो बड़ी प्रसन्न हुईं, अन्दर बुलाया और सोफे पे बैठाया। मैंने उनसे कहा कि मैडम अच्छे नम्बर लाने पर आपका मुंह मीठा कराने आया हूँ। तो वो कहने लगीं कि मैं भी तुम्हें मिठाई खिलाउंगी, तुम ही क्यूँ मैं मैं तुम्हारी कक्षा के सारे बच्चों को मिठाई खिलाउंगी , तुम सब लोगों ने मेरी नाक जो रख ली है। इसके बाद तो वो जैसे रुकने वाली ही नहीं थीं। कहने लगीं, "पता है तुम्हें कला संकाय के बच्चों को विद्यालय में सबसे ख़राब समझा जाता है ,कहीं भी कुछ भी हो तो नाम कला संकाय के बच्चों का ही लगता है। उन्हें ही बदनाम किया जाता है और मुझे भी बहुत कुछ सुनना पड़ता है कि कैसी वर्ग शिक्षिका हूँ, अपनी कक्षा के बच्चों को भी नहीं संभाल सकतीं। मुझे बड़ा दुःख होता है पर अब कोई गम नहीं है मुझे। तुमलोगों ने मेरा सम्मान बढाया है। यह साबित कर दिया है कि कला संकाय के बच्चे भी पढ़ते हैं।" वो आगे कहने लगीं "'मैं तुमलोगों को हर बात पे बुरा भला कहती थी इसलिए कि आगे चल कर तुमलोगों को कोई दिक्कत नहीं हो। आगे भविष्य में तुमलोगों को अपना ध्यान ख़ुद ही रखना होगा इस लिए डांट डांट कर तुम लोगों में अच्छी आदतें डालने की कोशिश करती थी। आगे तुमको बोलने वाला तो कोई नहीं होगा ना। तुम आत्मनिर्भर बनो इसीलिए तुम लोगों को डांट पिलाती थी। मुझे भी बच्चों को डांटना अच्छा नहीं लगता और अब भी बुरा लगता है पर उनके उज्जवल भविष्य के लिए इतना तो करना ही पड़ेगा न। कल के सुख के लिए आज तो उनको कड़वी डांट सुननी ही पड़ेगी"। अपने बारे में कहने लगीं कि उन्होंने शादी इसलिए नहीं की क्यूँ कि उनकी पढ़ाई के वक्त ही उनके पिता गुज़र गए थे और घर का सारा बोझ उनके कन्धों पर आ गया था। तब उन्होंने ये निश्चय किया था कि वो अपने भाई और बहिन, सभी को पढायेंगी और माँ का भी ख्याल रखेंगी। और आज उनके भाई बहिन ऊँचे ओहदों पर हैं और उनकी जिंदगी सुख शान्ति से कट रही है। सबका ख्याल हमेशा उन्होंने ही रखा और गलती करने पर खूब डांटा । इतना सब कहने के बाद आख़िर में उन्होंने बस इतना कहा कि हम सब ही तो उनके बच्चे हैं, उन्हें और क्या चाहिए। हमलोगों का भविष्य अच्छा हो इसीलिए तो दिन राह वो हमारे पीछे पड़ी रहती thin। अब उनको कोई चिंता नहीं है. सब अच्छे से पास हो गए हैं और सब को अच्छे कॉलेज मिल ही जायेंगे। बात ख़त्म होने पर मैं उनके चरण स्पर्श कर के बाहर निकल आया।
अब मैं रास्ते भर बस सोच रहा था। मुझे लग रहा था कि हम कितने ग़लत थे जो हमने मैडम को ग़लत समझा । मैडम की डांट तो दिखती थी पर किस वजह से वो हमें डांटा करती थीं वो नहीं दीखता था। वो हमें दो-चार खरी-खोटी सुनती थीं बस यही याद रहता था पर हमारी वजह से उनको कितना कुछ सुनना पड़ता था वो हमें पता नहीं चलता था। हमलोगों को उनका निष्ठुर व्यक्तित्व ही नज़र आता था पर उनका स्नेह पूर्ण ह्रदय कभी भी दृष्टिगोचर नहीं होता था। ये सब सोच-सोच कर मैं आत्मग्लानी से भर गया। मेरे नेत्र ही नहीं मेरा ह्रदय भी रो रहा था। पर प्रायश्चित हो तो कैसे हो? मैंने मैडम की सच्चाई अपने सारे सहपाठियों को बता दी। वो भी पश्चात्ताप में डूब गए। सबके दिल में उनके प्रति आदर और सम्मान अंकुरित हो गया। उस दिन के बाद मैंने किसी को मैडम के बारे में कुछ भी बुरा कहते हुए नहीं सुना। मैंने उसी वक्त उन्हें दिल से अपनी दूसरी माँ मान लिया था।
आज इस घटना को ३ साल बीत गए हैं पर एक भी दिन को मैं उन्हें भूला नहीं हूँ। मैं इश्वर से बस यही प्रार्थना करता हूँ कि सबको ऐसी ही शिक्षिका या शिक्षक मिलें जो उसके चरित्र और भविष्य की चिंता करती हों या करते हों और अप्रत्यक्ष रूप से उसका सहयोग करते हों उसे एक अच्छा इंसान बनने में। सबको ऐसे गुरु नसीब हों। उन महान विभूति को सत-सत प्रणाम।
अमित सागर
तृतीय वर्ष
इतिहास (प्रतिष्ठा)
सबकी जिंदगी की तरह मेरी जिंदगी में भी ऐसी ही एक शक्शियत ने कभी किसी समय प्रवेश किया था। उनसे प्रथम मुलाकात से लेकर आखिरी मुलाकात तक सबकुछ मुझे जस का तस याद है। वो मेरी हायर सेकेंडरी की शिक्षिका डॉ. इंदुमती पाठक थीं जो मुझे हिन्दी पढाया करती थीं। यह कहानी या यों कह लें की मेरी यह संस्मृति उनको मेरी ऑर से श्रधांजलि है। इस कहानी को लिखने की वजह अभी -अभी गुजरा शिक्षक दिवस है जिसने मुझे मजबूर कर दिया कि आप सब के सामने मैं अपने अनुभव को रख सकूँ। सब की तरह मुझे भी बहुत से शिक्षकों ने पढाया है और सब ने मेरी जिंदगी को किसी न किसी हद तक प्रभावित किया है पर जो प्रभाव उन्होंने मेरे व्यक्तित्व पर छोड़ा है वो अमिट है। यही वो लम्हें हैं जो मेरी बेशकीमती पूंजी हैं।
मैं उनसे ग्यारहवीं कक्षा में प्रथम बार मिला था। वो मेरी वर्ग शिक्षिका थीं। शायद इसीलिए हमसे कठोरता भरा बर्ताव करती थीं। हमारी किसी भी गलती पर वो हमे बक्क्षती नहीं थीं। हमारे अन्दर एक डर समाया रहता था कि कहीं भी कोई गलती हुई तो उनसे डांट सुननी पड़ेगी। मैं तो उनसे दो थप्पड़ भी खा चुका था। स्कूल लेट पहुँचने पर, पोशाक साफ़ और इस्त्री नहीं होने पर, बाल छोटे नहीं होने पे , और तो और जूते पोलिश न होने पर डांट पड़ती थी और वो हमें कक्षा से कान पकड़ के बाहर भी कर देती थीं। वो हमारी एक भी बात नहीं सुनती थीं। कक्षा के बिगडे से बिगडे बच्चे भी उनके सामने पानी भरते थे, भीगी बिल्ली बने रहते थे।
इसी तरह वक्त गुज़रता जा रहा था। हमलोग अब बारहवीं में आ गए थे और खुश थे कि अब इंदु मैडम वर्ग शिक्षिका नहीं होंगीं, सो कोई रोक-टोक नहीं होगी, कोई डांट नहीं, कोई डर नहीं होगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इंदु मैडम फिर से हमारी वर्ग शिक्षिका नियुक्त हुईं थीं। जब हमें पता चला तो हमारी तो समझो नानी ही मर गई हो। सब के सब शोक में डूब गए। उनके रवैये में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। एक बार की घटना है। कक्षा में मैडम उपस्थिति दर्ज कर रहीं थीं। मेरा क्रमांक जब गुज़र गया तब मैं कक्षा में पहुँचा। मेरी उपस्थिति दर्ज नहीं की गयी। मैंने मैडम से कहा तो उन्होंने कहा कि तुम लेट आए हो, हाजिरी नहीं बनेगी। मुझे बड़ा गुस्सा आया। मैंने इसकी शिकायत प्रधानाचार्य से की तो उन्होंने मुझे ही उल्टा डांट दिया और कहने लगे कि मैं ही समय पर विद्यालय आया करूँ। मैं मन मसोस कर रह गया। उनका डर हर पल और अधिक गहरा होता जा रहा था। एक दिन हम अपने अंग्रेजी के शिक्षक से मैडम के बारे में बात कर रहे थे। हम ने उन्हें बताया कि हमें मैडम से बहुत डर लगता है तो वो कहने लगे कि उनको भी मैडम से बहुत डर लगता है। हम तो जैसे सकते में आ गए। बस ये ही सोचने लगे कि ये कैसी माया है, शिक्षक को भी शिक्षक का डर है।
वक्त इसी तरह गुज़रता जा रहा था। कुछ दिनों बाद मुझे ये पता चला कि मैडम ने अब तक शादी नहीं की है। इसलिए उनकी कोई संतान नहीं है। हम इसी वजह से ये सोचने लगे कि अपनी कोई संतान नहीं है तभी मैडम इतनी निष्ठुर हैं। इसीलिए उनकों बच्चों से स्नेह नहीं है, बच्चों से प्रेम नहीं है। हम उन से बहुत नफ़रत करने लगे थे। और ये चाहते थे कि कब इस जंजाल से हमारा पीछा छूटे। आख़िर विद्यालय से निकलने का वक्त आ ही गया। हमारी बारहवीं की परीक्षाएं आ गयीं थीं। मैं बड़ा खुश हुआ कि अब कोई झंझट नहीं रहेगा । दिन अब अच्छे से बीतेगा। मेरी कक्षा के सारे बच्चों ने खूब मेहनत की परीक्षा के लिए। हमने कोई कसार नहीं छोड़ी। फिर परीक्षा के बाद परिणाम आया।
मेरी कक्षा का कोई भी बच्चा फेल नहीं हुआ। सब के सब अच्छे नम्बर से पास हो गए थे।
मेरा परिणाम सबसे अच्छा था सो मैंने सोचा कि मैडम का मुंह मीठा करा देना चाहिए इतनी बड़ी खुशी जो मिली थी। और अब कोई डर भी नहीं था मैडम की डांट का। मैंने प्रथम स्थान जो पाया था परीक्षा में। मैं शाम को सीधे उनके घर गया ,साथ में मिठाई का डब्बा भी था। उनके घर पहुँचने के बाद डोरबेल बजायी तो वो वो बाहर आयीं। मुझे देख कर वो बड़ी प्रसन्न हुईं, अन्दर बुलाया और सोफे पे बैठाया। मैंने उनसे कहा कि मैडम अच्छे नम्बर लाने पर आपका मुंह मीठा कराने आया हूँ। तो वो कहने लगीं कि मैं भी तुम्हें मिठाई खिलाउंगी, तुम ही क्यूँ मैं मैं तुम्हारी कक्षा के सारे बच्चों को मिठाई खिलाउंगी , तुम सब लोगों ने मेरी नाक जो रख ली है। इसके बाद तो वो जैसे रुकने वाली ही नहीं थीं। कहने लगीं, "पता है तुम्हें कला संकाय के बच्चों को विद्यालय में सबसे ख़राब समझा जाता है ,कहीं भी कुछ भी हो तो नाम कला संकाय के बच्चों का ही लगता है। उन्हें ही बदनाम किया जाता है और मुझे भी बहुत कुछ सुनना पड़ता है कि कैसी वर्ग शिक्षिका हूँ, अपनी कक्षा के बच्चों को भी नहीं संभाल सकतीं। मुझे बड़ा दुःख होता है पर अब कोई गम नहीं है मुझे। तुमलोगों ने मेरा सम्मान बढाया है। यह साबित कर दिया है कि कला संकाय के बच्चे भी पढ़ते हैं।" वो आगे कहने लगीं "'मैं तुमलोगों को हर बात पे बुरा भला कहती थी इसलिए कि आगे चल कर तुमलोगों को कोई दिक्कत नहीं हो। आगे भविष्य में तुमलोगों को अपना ध्यान ख़ुद ही रखना होगा इस लिए डांट डांट कर तुम लोगों में अच्छी आदतें डालने की कोशिश करती थी। आगे तुमको बोलने वाला तो कोई नहीं होगा ना। तुम आत्मनिर्भर बनो इसीलिए तुम लोगों को डांट पिलाती थी। मुझे भी बच्चों को डांटना अच्छा नहीं लगता और अब भी बुरा लगता है पर उनके उज्जवल भविष्य के लिए इतना तो करना ही पड़ेगा न। कल के सुख के लिए आज तो उनको कड़वी डांट सुननी ही पड़ेगी"। अपने बारे में कहने लगीं कि उन्होंने शादी इसलिए नहीं की क्यूँ कि उनकी पढ़ाई के वक्त ही उनके पिता गुज़र गए थे और घर का सारा बोझ उनके कन्धों पर आ गया था। तब उन्होंने ये निश्चय किया था कि वो अपने भाई और बहिन, सभी को पढायेंगी और माँ का भी ख्याल रखेंगी। और आज उनके भाई बहिन ऊँचे ओहदों पर हैं और उनकी जिंदगी सुख शान्ति से कट रही है। सबका ख्याल हमेशा उन्होंने ही रखा और गलती करने पर खूब डांटा । इतना सब कहने के बाद आख़िर में उन्होंने बस इतना कहा कि हम सब ही तो उनके बच्चे हैं, उन्हें और क्या चाहिए। हमलोगों का भविष्य अच्छा हो इसीलिए तो दिन राह वो हमारे पीछे पड़ी रहती thin। अब उनको कोई चिंता नहीं है. सब अच्छे से पास हो गए हैं और सब को अच्छे कॉलेज मिल ही जायेंगे। बात ख़त्म होने पर मैं उनके चरण स्पर्श कर के बाहर निकल आया।
अब मैं रास्ते भर बस सोच रहा था। मुझे लग रहा था कि हम कितने ग़लत थे जो हमने मैडम को ग़लत समझा । मैडम की डांट तो दिखती थी पर किस वजह से वो हमें डांटा करती थीं वो नहीं दीखता था। वो हमें दो-चार खरी-खोटी सुनती थीं बस यही याद रहता था पर हमारी वजह से उनको कितना कुछ सुनना पड़ता था वो हमें पता नहीं चलता था। हमलोगों को उनका निष्ठुर व्यक्तित्व ही नज़र आता था पर उनका स्नेह पूर्ण ह्रदय कभी भी दृष्टिगोचर नहीं होता था। ये सब सोच-सोच कर मैं आत्मग्लानी से भर गया। मेरे नेत्र ही नहीं मेरा ह्रदय भी रो रहा था। पर प्रायश्चित हो तो कैसे हो? मैंने मैडम की सच्चाई अपने सारे सहपाठियों को बता दी। वो भी पश्चात्ताप में डूब गए। सबके दिल में उनके प्रति आदर और सम्मान अंकुरित हो गया। उस दिन के बाद मैंने किसी को मैडम के बारे में कुछ भी बुरा कहते हुए नहीं सुना। मैंने उसी वक्त उन्हें दिल से अपनी दूसरी माँ मान लिया था।
आज इस घटना को ३ साल बीत गए हैं पर एक भी दिन को मैं उन्हें भूला नहीं हूँ। मैं इश्वर से बस यही प्रार्थना करता हूँ कि सबको ऐसी ही शिक्षिका या शिक्षक मिलें जो उसके चरित्र और भविष्य की चिंता करती हों या करते हों और अप्रत्यक्ष रूप से उसका सहयोग करते हों उसे एक अच्छा इंसान बनने में। सबको ऐसे गुरु नसीब हों। उन महान विभूति को सत-सत प्रणाम।
अमित सागर
तृतीय वर्ष
इतिहास (प्रतिष्ठा)
Friday, July 17, 2009
Thursday, July 16, 2009
दर्द है कितना
दर्द है इतना मुझको
फ़िर भी कह नहीं सकता मैं तुझको
तन्हाई क्या होती है ?
समझ लो बस जीने नहीं देती है
बीच भंवर में कश्ती का साथ जब छुटा
एक तिनका मिला
बदकिस्मती अपनी
वो तिनका भी किसी और का निकला
काटना नहीं ये पहाड़ सा वक़्त
हर लम्हा लगता है पत्थर सा सक्त
डर है मुझको
कहीं मैं भी पत्थर न बन जाऊं
इन पथरीले लम्हों के बीच
अब बाकी बचा न वो एहसास
जिन्दा रख सकूँ मैं जिस से
अपने दिल को सींच
जो साथ था कारवां मेरे
वो तो कभी का ,कहीं छूट गया
मैंने शायद गलती की
राहों को चुनने में
तभी तो मेरा घरौंदा
मुझी से रूठ गया
अब क्या करूँ मैं
समझ नहीं आता
सोच के देखो
मेरा दर्द-ऐ-दिल और क्या गाता
--अमित सागर
दर्द है इतना मुझको
फ़िर भी कह नहीं सकता मैं तुझको
तन्हाई क्या होती है ?
समझ लो बस जीने नहीं देती है
बीच भंवर में कश्ती का साथ जब छुटा
एक तिनका मिला
बदकिस्मती अपनी
वो तिनका भी किसी और का निकला
काटना नहीं ये पहाड़ सा वक़्त
हर लम्हा लगता है पत्थर सा सक्त
डर है मुझको
कहीं मैं भी पत्थर न बन जाऊं
इन पथरीले लम्हों के बीच
अब बाकी बचा न वो एहसास
जिन्दा रख सकूँ मैं जिस से
अपने दिल को सींच
जो साथ था कारवां मेरे
वो तो कभी का ,कहीं छूट गया
मैंने शायद गलती की
राहों को चुनने में
तभी तो मेरा घरौंदा
मुझी से रूठ गया
अब क्या करूँ मैं
समझ नहीं आता
सोच के देखो
मेरा दर्द-ऐ-दिल और क्या गाता
--अमित सागर
Wednesday, July 15, 2009
Saturday, February 21, 2009
सौ बार जीता सौ बार मरता हूँ
कैसे ऐतबार दिलाऊं तुमको
कि कितना प्यार है
तुमसे हमको
रोता हूँ इसलिए
कि तुम समझ न सकीं
मुझको मेरे प्यार को
जीता हूँ इसलिए कि
कभी न कभी पा सकूँ
तुमको, तुम्हारे प्यार को
जुदा हूँ तुम से मैं आज
और ये जुदाई
दर्द देती है इतना के
जितना मैं सह न सकूँ
फिर भी प्यार तुमसे मैं करता हूँ
एक एक पल में
सौ बार जीता हूँ, मरता हूँ
----अमित सागर
कैसे ऐतबार दिलाऊं तुमको
कि कितना प्यार है
तुमसे हमको
रोता हूँ इसलिए
कि तुम समझ न सकीं
मुझको मेरे प्यार को
जीता हूँ इसलिए कि
कभी न कभी पा सकूँ
तुमको, तुम्हारे प्यार को
जुदा हूँ तुम से मैं आज
और ये जुदाई
दर्द देती है इतना के
जितना मैं सह न सकूँ
फिर भी प्यार तुमसे मैं करता हूँ
एक एक पल में
सौ बार जीता हूँ, मरता हूँ
----अमित सागर
जिंदा किस लिए हूँ ?
मैं जिंदा किस लिए हूँ ?
बस तेरे लिए
बस तुझे पाने के लिए
और जो तुझे न पा सका
तो जी के क्या होगा
मरना ही शायद तब भला होगा
क्यूंकि सह न पाउँगा फिर तेरी जुदाई मैं
तड़प के रह जाऊँगा तेरी तन्हाई में
बिरहा की अग्नि में जल जाऊँगा
मैं तो बस मर जाऊँगा
ए मेरे खुदा -
जीते जी मत मारना मुझे
अच्छा होगा मेरी प्रिया
दे देना मुझे
साँसे मेरी लौटा देना मुझे
इश्क की दुहाई है तुझे
वरना कोई न फिर
तुझे से प्यार की भीख मांगेगा
बस प्यार की तड़प में अपनी जान देगा
मत करना नाइंसाफी मेरे साथ
रख देना मेरे सर पे तू अपना हाथ
दे देना उसे मुझे तू
दिल मेरा देगा तुझे दुआएं लाख
जलती रहेंगी तब तक
मेरे दिल में उम्मीदें
जब तक दे नहीं देता
उसे मुझे तू
-----अमित सागर
मैं जिंदा किस लिए हूँ ?
बस तेरे लिए
बस तुझे पाने के लिए
और जो तुझे न पा सका
तो जी के क्या होगा
मरना ही शायद तब भला होगा
क्यूंकि सह न पाउँगा फिर तेरी जुदाई मैं
तड़प के रह जाऊँगा तेरी तन्हाई में
बिरहा की अग्नि में जल जाऊँगा
मैं तो बस मर जाऊँगा
ए मेरे खुदा -
जीते जी मत मारना मुझे
अच्छा होगा मेरी प्रिया
दे देना मुझे
साँसे मेरी लौटा देना मुझे
इश्क की दुहाई है तुझे
वरना कोई न फिर
तुझे से प्यार की भीख मांगेगा
बस प्यार की तड़प में अपनी जान देगा
मत करना नाइंसाफी मेरे साथ
रख देना मेरे सर पे तू अपना हाथ
दे देना उसे मुझे तू
दिल मेरा देगा तुझे दुआएं लाख
जलती रहेंगी तब तक
मेरे दिल में उम्मीदें
जब तक दे नहीं देता
उसे मुझे तू
-----अमित सागर
चकनाचूर हो गया
जिंदगी में एक वाक्य सा हो गया
लगता है जैसे कहीं कुछ खो गया ll
वो दिन, वो पल बहुत याद आते हैं
पर कहाँ वापिस आएगा एक बार जो गया ll
जी लेता हूँ कभी-कभी, उन यादों को याद कर
पर कब तक जी सकूंगा, जब अपना ही बेगाना हो गया ll
कोशिश तो बहुत की थी, की सपनों को सच कर दूँ
पर हसरतों को हकीक़त में बदलना ही एक सपना सा हो गया ll
माना जिंदगी ने हमें बहुत कुछ दिया, हमनें भी बहुत कुछ किया
पर जो आशियाँ था मेरा, जो जहाँ था मेरा, चकनाचूर हो गया ll
अमित सागर
जिंदगी में एक वाक्य सा हो गया
लगता है जैसे कहीं कुछ खो गया ll
वो दिन, वो पल बहुत याद आते हैं
पर कहाँ वापिस आएगा एक बार जो गया ll
जी लेता हूँ कभी-कभी, उन यादों को याद कर
पर कब तक जी सकूंगा, जब अपना ही बेगाना हो गया ll
कोशिश तो बहुत की थी, की सपनों को सच कर दूँ
पर हसरतों को हकीक़त में बदलना ही एक सपना सा हो गया ll
माना जिंदगी ने हमें बहुत कुछ दिया, हमनें भी बहुत कुछ किया
पर जो आशियाँ था मेरा, जो जहाँ था मेरा, चकनाचूर हो गया ll
अमित सागर
Monday, February 11, 2008
जिंदगी
जिंदगी तो सभी जीते हैं
मगर जो कुछ कर-गुज़रते हैं
वही चुनिंदा होते हैं
जिंदगी की नेमत तो
बस मिलती है एक बार
इसे हंसी, ख़ुशी से गुजार दो
दूध का क़र्ज़ उतार दो
कोई झुक जाता है,
रूक जाता है कोई
पर जो आगे बढ़ते जाता है
वही सितारों से भरी
बुलंदी को पाता है
सुना है बड़ी शिद्दत से मिलता है
जीने का एक अनमोल अवसर
तो क्यों ना इसका लाभ उठाएं
अपने नाम को सदा के लिए
अमर कर जाएँ
होती है जिंदगी हर किसी की अपनी
इसे है जीना अपने ढंग से
हमें न बदल पाए ये दुनिया
बल्कि हम ही सजायें उसे
अपने रंग से
अमित सागर
प्रथम इतिहास (प्रतिष्ठा)
जिंदगी तो सभी जीते हैं
मगर जो कुछ कर-गुज़रते हैं
वही चुनिंदा होते हैं
जिंदगी की नेमत तो
बस मिलती है एक बार
इसे हंसी, ख़ुशी से गुजार दो
दूध का क़र्ज़ उतार दो
कोई झुक जाता है,
रूक जाता है कोई
पर जो आगे बढ़ते जाता है
वही सितारों से भरी
बुलंदी को पाता है
सुना है बड़ी शिद्दत से मिलता है
जीने का एक अनमोल अवसर
तो क्यों ना इसका लाभ उठाएं
अपने नाम को सदा के लिए
अमर कर जाएँ
होती है जिंदगी हर किसी की अपनी
इसे है जीना अपने ढंग से
हमें न बदल पाए ये दुनिया
बल्कि हम ही सजायें उसे
अपने रंग से
अमित सागर
प्रथम इतिहास (प्रतिष्ठा)
दोस्त और दोस्ती
मैंने भी दोस्ती की है
दोस्त मुझे भी मिले हैं
खुशनसीब हूँ
इसलिए जिंदगी में मेरी
दोस्ती के फूल खिले हैं
बहुत वक़्त गुज़रता है
दोस्तों के साथ
हर दिन हर रात
इस कदर करीब हैं कि
होती है बस उनकी बात
कभी वो रुठते हैं
कभी मैं रूठता हूँ
कभी वो मनाते हैं
कभी मैं मनाता हूँ
दोस्ती से ही
ज़िंदगी के हर पल
को जगमगाता हूँ
जब कभी वो दूर होते हैं
तो याद बहुत करता हूँ
इस लिए दोस्तों की दूरी से
बहुत डरता हूँ
जब कभी मुसीबत है आती
मुश्किलों से सामना होता है
तो एक पूकार पे वो
दौड़े चले आते हैं
मुझसे पहले वो
मेरी मुश्किलों को
अपना सीना दिखाते हैं
इसलिए तो नाज़ उनपर
करता हूँ
फक्र है कि वो
ऐसे दोस्त हैं
ऐसी दोस्ती है
उनकी दोस्ती से ही
तो ये जिंदगी है
अमित सागर
प्रथम इतिहास(प्रतिष्ठा)
मैंने भी दोस्ती की है
दोस्त मुझे भी मिले हैं
खुशनसीब हूँ
इसलिए जिंदगी में मेरी
दोस्ती के फूल खिले हैं
बहुत वक़्त गुज़रता है
दोस्तों के साथ
हर दिन हर रात
इस कदर करीब हैं कि
होती है बस उनकी बात
कभी वो रुठते हैं
कभी मैं रूठता हूँ
कभी वो मनाते हैं
कभी मैं मनाता हूँ
दोस्ती से ही
ज़िंदगी के हर पल
को जगमगाता हूँ
जब कभी वो दूर होते हैं
तो याद बहुत करता हूँ
इस लिए दोस्तों की दूरी से
बहुत डरता हूँ
जब कभी मुसीबत है आती
मुश्किलों से सामना होता है
तो एक पूकार पे वो
दौड़े चले आते हैं
मुझसे पहले वो
मेरी मुश्किलों को
अपना सीना दिखाते हैं
इसलिए तो नाज़ उनपर
करता हूँ
फक्र है कि वो
ऐसे दोस्त हैं
ऐसी दोस्ती है
उनकी दोस्ती से ही
तो ये जिंदगी है
अमित सागर
प्रथम इतिहास(प्रतिष्ठा)
Wednesday, December 12, 2007
तुम्हारे लिए
तुम्हारे लिए मैंने
क्या-क्या नहीं किया
एक-एक पल बस
तुम्हें देख कर जीया
तुमने मेरा प्यार कबूल
नहीं किया
इस दर्द में मैं
तदपा
फिर भी याद
तुम्हीं को किया
कोशिश पे कोशिश
दर कोशिश
मुकद्दर ने हमारा
मजाक उड़ाया
इस पर भी उपरवाले को
हम पे तरस न आया
तुम भी क्या कम थी
तानों पे ताने
उस पर भी हमारा
दिल जलाने में
तुम्हें मज़ा आया
हमें खून के आंसू रुलाया
इश्क कि नाकामयाबी
के सदमे ने हमें
कभी कुछ करने नहीं दिया
फिर भी इस दर्द
के नाम,
तेरे नाम
अपनी पूरी जिंदगी
को किया
--अमित सागर
क्या-क्या नहीं किया
एक-एक पल बस
तुम्हें देख कर जीया
तुमने मेरा प्यार कबूल
नहीं किया
इस दर्द में मैं
तदपा
फिर भी याद
तुम्हीं को किया
कोशिश पे कोशिश
दर कोशिश
मुकद्दर ने हमारा
मजाक उड़ाया
इस पर भी उपरवाले को
हम पे तरस न आया
तुम भी क्या कम थी
तानों पे ताने
उस पर भी हमारा
दिल जलाने में
तुम्हें मज़ा आया
हमें खून के आंसू रुलाया
इश्क कि नाकामयाबी
के सदमे ने हमें
कभी कुछ करने नहीं दिया
फिर भी इस दर्द
के नाम,
तेरे नाम
अपनी पूरी जिंदगी
को किया
--अमित सागर
Saturday, December 8, 2007
वो
देखता हूँ जब कभी उसे
पाता हूँ एक
प्रेरणादायी श्रोत के रुप में
चट्टान सी दृढ़ता
कर्त्तव्यनिष्ठा भास्कर सी
रश्मियों सी चंचलता
जल सी द्रवता
धैर्य अवनि सा
समय सी निरंतरता
प्रेम भावना, सामंजस्य, दृढ़ता एवं
सौंदर्य की
अकूत सम्पदा लिए हुए
वो चली आ रही है
या कहूं
कि
जग को चला रही है
कोई दूसरा नहीं है
उसके जैसा
क्यूंकि
वो तो वो है
देखो वो चली आ रही है
लगता है मेरी तरफ ही आ रही है
चौधरी सुखवीर सिंह "भास्कर"
पाता हूँ एक
प्रेरणादायी श्रोत के रुप में
चट्टान सी दृढ़ता
कर्त्तव्यनिष्ठा भास्कर सी
रश्मियों सी चंचलता
जल सी द्रवता
धैर्य अवनि सा
समय सी निरंतरता
प्रेम भावना, सामंजस्य, दृढ़ता एवं
सौंदर्य की
अकूत सम्पदा लिए हुए
वो चली आ रही है
या कहूं
कि
जग को चला रही है
कोई दूसरा नहीं है
उसके जैसा
क्यूंकि
वो तो वो है
देखो वो चली आ रही है
लगता है मेरी तरफ ही आ रही है
चौधरी सुखवीर सिंह "भास्कर"
वादा
चाहे सारे वादे
जो मैंने अब तक किये हैं
झूठे क्यों न हो जाएँ
पर ये वादा न झुठलाउंगा
कि तुमको मैं एक दिन पाऊंगा
वचन लेता हूँ मैं आज अपने आप से
कि एक दिन मैं तुमको पाउँगा
जो सोचते हैं लोग
कि मैं न कर पाउँगा
वो मैं कर के दिखलाउंगा
तुमने कभी मुझे अपने दिल में
आने नहीं दिया
प्यार का फूल खिलाने नहीं दिया
पर एक दिन
तुम्हारे दिल के एक कोने में
अपनी बंजर ज़मीं पर
लाल गुलाब खिलाऊंगा मैं
तुम देखोगी, ये दुनिया देखेगी
कि मैं भी क्या चीज़ हूँ
jo हो नहीं सकता मेरा
बनता हूँ कैसे दिल उसका
जां उसकी
जो मैंने अब तक किये हैं
झूठे क्यों न हो जाएँ
पर ये वादा न झुठलाउंगा
कि तुमको मैं एक दिन पाऊंगा
वचन लेता हूँ मैं आज अपने आप से
कि एक दिन मैं तुमको पाउँगा
जो सोचते हैं लोग
कि मैं न कर पाउँगा
वो मैं कर के दिखलाउंगा
तुमने कभी मुझे अपने दिल में
आने नहीं दिया
प्यार का फूल खिलाने नहीं दिया
पर एक दिन
तुम्हारे दिल के एक कोने में
अपनी बंजर ज़मीं पर
लाल गुलाब खिलाऊंगा मैं
तुम देखोगी, ये दुनिया देखेगी
कि मैं भी क्या चीज़ हूँ
jo हो नहीं सकता मेरा
बनता हूँ कैसे दिल उसका
जां उसकी
Friday, December 7, 2007
मरा होता है
क्या तुम ये जानती हो?
जब कोई किसी को
चाहता है
और वो उसे न मिलता है
तो कितनी पीड़ा होती है?
बस पीड़ा ही पीड़ा होती है
जब कोई किसी कि
अराधना करता है
उसकी साधना करता है
और उसकी साधना निष्फल हो जाती है
तो क्या होता है ?
वो अश्रु-पूर्ण भाव विकल हो जाता है
अपने ही होम में जल जाता है
अस्वीकार्य हो जाना
प्रेम न मिल पाना
उसके लिए तो कुछ नहीं
जिसे उसकी चाहत
मिल जाती है
पर जिसे न मिलती है
उसका क्या होता है
जिंदा हो के भी
वो मरा होता है
--अमित सागर
जब कोई किसी को
चाहता है
और वो उसे न मिलता है
तो कितनी पीड़ा होती है?
बस पीड़ा ही पीड़ा होती है
जब कोई किसी कि
अराधना करता है
उसकी साधना करता है
और उसकी साधना निष्फल हो जाती है
तो क्या होता है ?
वो अश्रु-पूर्ण भाव विकल हो जाता है
अपने ही होम में जल जाता है
अस्वीकार्य हो जाना
प्रेम न मिल पाना
उसके लिए तो कुछ नहीं
जिसे उसकी चाहत
मिल जाती है
पर जिसे न मिलती है
उसका क्या होता है
जिंदा हो के भी
वो मरा होता है
--अमित सागर
मुझसे अपने आप को नहीं
क्या तुम कभी
सुन सकती हो
मेरे दिल कि आवाज़ को
नहीं न
मेरा दिल चीखता है
चिल्लाता है
चित्कारता है
पर तुम क्यों सुनोगी
काश तुम्हारा दिल
कभी मेरे लिए धड़क उठे
और ये कह उठे
"हाँ मैं तुमसे प्यार करती हूँ
हाँ,अमित तुमसे ज्यादा
मुझे कोई चाह नहीं सकता"
पर तुम क्यों सुनोगी
तुम्हें सुनने कि ज़रूरत क्या है
इस दुखते दिल की टीस
क्या ज़रूरत है तुम्हें
इस रोते दिल की आंसुओं
को पोंछ्नें की
तुम टोह चाहती ही हो
मुझे पल-पल में सौ मौतें देना
अपने आपको मुझसे
छीन लेना
पर याद रखना प्रिया
तुम मेरी साँसे तो
छीन सकती हो
पर मुझसे अपने आपको नहीं
मेरी रूह को मिटा सकती हो
पर मुझसे अपने आप को नहीं
--अमित सागर
सुन सकती हो
मेरे दिल कि आवाज़ को
नहीं न
मेरा दिल चीखता है
चिल्लाता है
चित्कारता है
पर तुम क्यों सुनोगी
काश तुम्हारा दिल
कभी मेरे लिए धड़क उठे
और ये कह उठे
"हाँ मैं तुमसे प्यार करती हूँ
हाँ,अमित तुमसे ज्यादा
मुझे कोई चाह नहीं सकता"
पर तुम क्यों सुनोगी
तुम्हें सुनने कि ज़रूरत क्या है
इस दुखते दिल की टीस
क्या ज़रूरत है तुम्हें
इस रोते दिल की आंसुओं
को पोंछ्नें की
तुम टोह चाहती ही हो
मुझे पल-पल में सौ मौतें देना
अपने आपको मुझसे
छीन लेना
पर याद रखना प्रिया
तुम मेरी साँसे तो
छीन सकती हो
पर मुझसे अपने आपको नहीं
मेरी रूह को मिटा सकती हो
पर मुझसे अपने आप को नहीं
--अमित सागर
Sunday, November 25, 2007
Tuesday, November 6, 2007
पिता
उससे बहुत ही गहरा नाता है
वही तो हमारा सबसे बड़ा दाता है
सृजक की भूमिका वह निभाता है
पिता तो बस पिता होता है
वही हमें दुनिया दिखलाता है
ऊँगली पकड़ कर चलना सिखलाता है
अपने बच्चे को बोलना बतलाता है
पिता तो बस पिता होता है
नई पौध को पानी देता है
सूरज की तेज़ किरणों से उसे बचाता है
उसको कोई तकलीफ न हो
सो स्वयं ही सबकुछ सह जाता है
पिता तो बस पिता होता है
अपना पेट काट कर
हमें खाद खिलाता है
अच्छी से अच्छी सुविधा-सेवा करता है
निस्वार्थ भाव से हमारे लिए चिंतित रहता है
पिता तो बस पिता होता है
अपनी कृति के फल फूल जाने पर
वह चैन की एक सांस ले पाता है
सोचता है,
अब उसे क्या ग़म
बडे हो चुके होते हैं हम
अपनी आराधना पर मंद-मंद मुस्काता है
पिता तो बस पिता होता है
लेकिन होता है वही
जो हमेशा होता है
नए के आने पर पुराना उपेक्षित हो जाता है
भूल जाती है उसे नव पीड़ी
और भुला देती है उसके बलिदानों को
उनको मालूम न होता है कि
पिता तो बस पिता होता है
हमें अपना समझ कर
क्षमा पे क्षमा किये जाता है वो
और एक दिन बिना कुछ कहे -सुने
हमें अकेला छोड़ चला जाता है वो
तब हमें याद आता है कि
पिता तो बस पिता होता है
एक दिन हम भी पिता बनते हैं
जो उसने हमारे लिए किया था
वही हम नए के लिए करते हैं
फिर हमारे साथ भी वही होता है
क्योंकि,
पिता तो बस पिता होता है
--अमित सागर
उससे बहुत ही गहरा नाता है
वही तो हमारा सबसे बड़ा दाता है
सृजक की भूमिका वह निभाता है
पिता तो बस पिता होता है
वही हमें दुनिया दिखलाता है
ऊँगली पकड़ कर चलना सिखलाता है
अपने बच्चे को बोलना बतलाता है
पिता तो बस पिता होता है
नई पौध को पानी देता है
सूरज की तेज़ किरणों से उसे बचाता है
उसको कोई तकलीफ न हो
सो स्वयं ही सबकुछ सह जाता है
पिता तो बस पिता होता है
अपना पेट काट कर
हमें खाद खिलाता है
अच्छी से अच्छी सुविधा-सेवा करता है
निस्वार्थ भाव से हमारे लिए चिंतित रहता है
पिता तो बस पिता होता है
अपनी कृति के फल फूल जाने पर
वह चैन की एक सांस ले पाता है
सोचता है,
अब उसे क्या ग़म
बडे हो चुके होते हैं हम
अपनी आराधना पर मंद-मंद मुस्काता है
पिता तो बस पिता होता है
लेकिन होता है वही
जो हमेशा होता है
नए के आने पर पुराना उपेक्षित हो जाता है
भूल जाती है उसे नव पीड़ी
और भुला देती है उसके बलिदानों को
उनको मालूम न होता है कि
पिता तो बस पिता होता है
हमें अपना समझ कर
क्षमा पे क्षमा किये जाता है वो
और एक दिन बिना कुछ कहे -सुने
हमें अकेला छोड़ चला जाता है वो
तब हमें याद आता है कि
पिता तो बस पिता होता है
एक दिन हम भी पिता बनते हैं
जो उसने हमारे लिए किया था
वही हम नए के लिए करते हैं
फिर हमारे साथ भी वही होता है
क्योंकि,
पिता तो बस पिता होता है
--अमित सागर
Monday, November 5, 2007
एक शेर
फलक देता है जिनको ऐश
उनको गम भी होते हैं
जहाँ बजते हैं नक्कारे
वहाँ मातम भी होते हैं
--अज्ञात
उनको गम भी होते हैं
जहाँ बजते हैं नक्कारे
वहाँ मातम भी होते हैं
--अज्ञात
Sunday, November 4, 2007
लक्ष्य
जीवन का लक्ष्य एक है मेरा
कुछ हासिल करना है
बुलंदियों को छूना है
बस जो चाहता हूँ
वो कर दिखाना है
मंजिल तो दिख रही
पर दूर है
रास्ते काटों से भरपूर हैं
फिर भी लक्ष्य पाना तो है ही
एक दिन शिखर पर जाना
तो है ही
सिर्फ एक प्रयास कि जरूरत है
वह प्रयास हो मेहनत का
लक्ष्य पाने कि सच्ची लगन का
हर बाधा पार करने के जूनून का
तो फिर क्या दुर्जय रह जाएगा
सबकुछ,
ये पृथ्वी, ये आकाश
मेरा हो जाएगा
--अमित सागर
जीवन का लक्ष्य एक है मेरा
कुछ हासिल करना है
बुलंदियों को छूना है
बस जो चाहता हूँ
वो कर दिखाना है
मंजिल तो दिख रही
पर दूर है
रास्ते काटों से भरपूर हैं
फिर भी लक्ष्य पाना तो है ही
एक दिन शिखर पर जाना
तो है ही
सिर्फ एक प्रयास कि जरूरत है
वह प्रयास हो मेहनत का
लक्ष्य पाने कि सच्ची लगन का
हर बाधा पार करने के जूनून का
तो फिर क्या दुर्जय रह जाएगा
सबकुछ,
ये पृथ्वी, ये आकाश
मेरा हो जाएगा
--अमित सागर
Subscribe to:
Posts (Atom)
About Me
- Amit Sagar
- New Delhi, New Delhi, India
- I am Amit Sagar living presently in New Delhi originally from Patna.
Blog Archive
-
►
2009
(10)
- ► 10/04 - 10/11 (1)
- ► 09/27 - 10/04 (2)
- ► 09/06 - 09/13 (1)
- ► 07/12 - 07/19 (3)
- ► 02/15 - 02/22 (3)
-
►
2008
(2)
- ► 02/10 - 02/17 (2)
-
►
2007
(15)
- ► 12/09 - 12/16 (1)
- ► 12/02 - 12/09 (4)
- ► 11/25 - 12/02 (1)
- ► 11/04 - 11/11 (3)
- ► 10/28 - 11/04 (6)
